05 July 2017

पत्रकार



चाँद को ठोर देता हूँ,
पहाडो के राज़ कहता हूँ
बहुत मुश्किल नही है ये,
की दरख्तों को भी छॉंव देता हूँ मैं...

रास्ता सभी का एक ही है,
मंजिल भी एक ही है
बस सफर है ये के जहाँ,
खूsssल के सांस लेता हूं मैं...

झूंठ-फाश का शगल
है.. तो है ! तो ! है तो,है..
हाँ, माना के कभी कभी
मुसीबत, मोल लेता हूं मैं... 

मैं क्या हूँ, क्या हो तुम
चंद लम्हों में हो जायेंगे गुम
झूंठ बिकता है जिस बाज़ार में,
सच को बांच देता हूँ मैं...

दुआओं में जिंदा रहुंगा,
देखना गर सच कहुंगा मैं
मैं रहूं ना रहूँ, बेपरवाह हो
अफवाहों के पर कतर देता हूं मैं... 

ओट में छिपी हकीकत को
मुझसे देखा नही जायेगा
फिक्र यही है के किसी रोज ना
  मदमस्त इस और लेटा रहूं मैं...

~ #कुं‌_कपिल_सिंह_चौहान
+91 9407117155 
#Kapilsingh #mp360news #पत्रकार #Copyrightkapilsingh
— with Kunwar Kapil Singh Chauhan

18 January 2017

शिवराज भिया, तुमने नर्मदा किनारे दारु बेन कर के ठिक नी किया !!!

शिवराज_भिया, हां हम तुमे मामा भी के सकते हैं, क्योंकी हमाई अम्मा तो मां नर्मदा हैं.. और तुमने उसकी रक्षा का ठेका ले लिया है. तो तुम मामाइ हुए ना ! मगर पहले मेन बात तो सुन लो...
 
अमभी मध्यप्रदेश केई हैं.. और तुमने नर्मदा किनाये दारुबंदी का डिसजन ले कर ठिक नी किया... अरे, एक कारण तो ढंग्का बताओं की हमे लगे के तुमने भोत भेतरीन काम किया!! लोगहोन के रे हैं की इससे नर्मदा मय्या गन्दी नी होगी... नर्मदा मय्या कौन से पेग लगा रई थी जो वो दुकान पास होने से गंदी हो जाती ? बताओ कैसे गंदी हो जाती ? चलो, जो पिते हैं वो गंदी करते हैं, अपन ये भी नी मानते... कौन बेवडा होगा जो दारु जैसा बहुमुल्य पेय पदार्थ नर्मदा में ढोलता होगा ! जिसका कोई फायदा नी, हैं! अच्छा, छोरे होन के रे हैं की खाली बोतलें फेकते हैं पियक्कड , इसलिये बेन की है वआं... तो तुमने पानी की बोतलों पे तो बेन नी लगाया वां...कितने ही पानी फिल्टर प्लांट लग रे हें वां... टूरिस्ट भी पानी की बोतलें ले ले के किनारे पे मस्त पर्यटन करते हैं, उनपे तो बेन नी लगाया! फिर सुना की दारुडिये मांसमच्छी खा के नर्मदा में फेकंते हैं पानी में.. ये भी अपने गले नी उतरा... इतने सारे रेस्टोरेंट है 'मय्या' किनारे, जिनमे पांच किलोमीटर के दायरे में लोगहोन सब दबा के नानवेज सुतते हैं, उस पे तो बेन नी लगाया ! नी मेरे समजई, नी आया के आखेर तुम ने ये 'नेक' काम क्यों किया ! मुझे तो तुम मुख्यमंत्री कम, एक कथावाचक ज़्यादा लगते हो. तुम बोलते भी विश्व में सबसे ज़्यादा शब्द प्रतिमिनट हो.. पिछले चुनाव में तुमने भिया, मोदी जी से ज़्यादा शब्द प्रति मिनट बोले थे.. एक कथा वाचक ही ये कर सकता है... महाराज और संतओन जैसेइ, सेम लगते हो तुम मेरे को... हर जगह आनन्दम-आनन्दम ये कोई संत ही कर सकता है... तुम्हारे प्रवचन ! सॉरी, भाषण भी सेम लगते हैं... एक कथा वाचक की तरह तुम भाषण दे जाते हो, और उन पर अमल तो कोई नी करता, तुम्हारी सरकारइ नी करती तो और कोन करेगा. वेसेई जैसे संतों की बात पे कोई अमल नी करता...और लोग होन केते हैं के तुम "घोषणा-वीर" मुख्यमंत्री हो.. अरे समजेइ नी भिया वो लोग, के तुम संत हो संत... इसिलिये तो तुमने नर्मदा किनारे दारुबंदी कर दी... मगर तुमने बहुत बुरा किया भिया...
जिंदगी में दो तीन मौके आये जब हमारा मन बहुत खराब हो गया... मजाई नी बचा जीवन में... रसइ नी था.. भेंकर से भेंकर विपदायें आन पडी जीवन में... हमे सोची के अब तो नर्मदा मय्या के आंचल में छलांग लगा के अपनी जीवनलीला समाप्त कर लें. मगर जैसे जैसे नर्मदा मय्या के करीब जाते, वैसे-वैसे वो दारु का ठेका हमारे पास आता. हम जाते तो फूल मूड बना के मरने का. मगर उसके पहले ही रस्ते में ठेका मिल जाता... मरने से पहले आखरी दो पेग लगाते के, मोसम एक दम से सुहाना होने लग जाता... तुम्हारी कसम नर्मदा के किनारे जा के भी हम छलांग नी लगा पाये. छलांग लगाने के पेलेइ हमे एक नई ताकत मिल जाती... मन जोश से भर जाता... हम थोडा टेम लपलपाती लहरों को देखने बेठ जाते.. और नई प्रेरणा मिलती.. हम सोचते के "मां नर्मदा" के जीवन मेंइ इतने थपेडे हैं, ऐसी खतरनाक लहरे हैं तो हमारी क्या बिसात.. हम सोचते के थोडे कष्ट तो हम भी भोग सकते हैं.. लहरों का क्या है..थोडे उतार चडाव तो सबके जीवन में होतेइ हैं... बस हर दफा इसी तरह, हम बगैर छलांग लगाये लौट आये...मगर भिया आज पता नी क्या होगा. आज भी हम भोत निराश हो गये ज़िन्दगी से... आज फिर हम मरना चाहते हैं... और जैसे-जैसे नर्मदा मय्या के किनारे जायेंगे, वैसे-वैसे हमारी ज़िंदगी पर खतरा बढता जायेगा.. क्योंकी आज वो दारु का ठेका हमको रस्ते में नी मिलेगा.. जो तुम्हारे केने से बंद हो गया है...
~कपिल सिंह चौहान
+91 9407117155
 

08 January 2017

सिर्फ लडकी नही है वो...



सिर्फ लडकी नही है, वह दोस्त है तुम्हारी. अजनबी भी हो सकती है, सहयात्री भी हो सकती है किसी बस में, ऑटो में, सहकर्मी भी हो सकती है ऑफीस में, राहगीर भी हो सकती है. उसी रास्ते जिस रास्ते तुम चल रहे हो वह भी किसी काम से या युं ही टहलने या किसी मूड में या तफरी करने या आवारगी में ही घुमने निकली हो. प्लीज़ अकेली छोड दो उसेवह तुम से कुछ नही चाहती. रहने दो उसे मस्ती में. जब तक वह खुद तुम से कुछ मांगे ना... वह तो तुम से मदद भी नही मांगेगी... पता है क्यों !! क्योंकी तुम आदमी हो... क्योंकी वह जानती है की दुनिया में ज़्यादातर आदमी ही हैं, मर्द तो बहुत कम हैं... वह डरती है तुम से क्योंकी तुम सिर्फ आदमी हो...

तुम भी तो अपने कम्फर्ट के लिये शॉर्ट पहन कर निकले थे ना घर से... तो उसे भी कम्फर्ट में रहने दो ना. जैसे वो चाहे... सिर्फ तुम्हारी ही वजह से क्योंकी तुम आदमी हो और वह जानती है की तुम उसे रास्ते में मिलोगे इसलिये वह घर से निकलने पर अनकॉम्फर्ट ही रहती है... कॉम्फर्टेबल तो सिर्फ घर में ही रह पाती है... वजह तुम हो... और तुमने समझ लिया की उसे तो हक ही नही वेसा रहने का इसलिये वह ऐसा रहती है...

वह तुम्हे ड्रिंक करते दिखी तो तुमने समझ लिया की वह मूड में है!!!  उसे थोडी चड गयी तो तुम समझे इसे कुछ चाहीये... अरे भाई !! हाँ वह मूड में है... मगर सिर्फ ड्रिंक करने के मूड में है... 

तुम्हे उसके वेस्टर्न पहनने से दिक्कत है... उसने तो अब तक सलवार कुर्ता भी पहना... तब भी तुमने उसे बख्शा नही... तुम ट्रेन में हो या बस में, तुम ऑफीस में हो या घर पर, हर जगह.  जैसे, तुम ड्रायविंग सीट पर बैठे हो या पिछे वाली सीट पर सफर कर रहे हो...जब वह तुम्हारे रिक्शा में पैर रख कर बैठने की कोशीश करती है, उसी वक्त तुम उसे बता देते हो की तुम आदमी हो. उसके रिक्शा में घुसने के लिये झूकते वक्त जब तुम अपनी सीट पर थोडा उठ कर पता कर रहे थे ना की वह, कुर्ती के अंदर से कैसी है तभी वह जान गयी थी की तुम मर्द नही हो... तुम सिर्फ आदमी हो... उसने तुम से कुछ कहा नही, किसी से भी नही कहा, बस वह जान गयी... किससे कहती... किसको सुनाती... सुनने वाले भी तो ज़्यादातर आदमी ही हैं...

तुम्हारी मां, बहिन या पत्नी ने भी तो कभी सलवार-कुर्ता पहना होगा... वो भी तो स्कूल या ऑफिस जाती होंगी, वो भी तो ट्रेन में सफर करती हैं ... बस-रिक्शा में चढती हैं. हम सबकी मां-बहने, पत्नी वही करती हैं, वही सहती हैं जो 'वो' सहती है... और इन सभी को सार्वजनिक जीवन में 'आदमी' मिलते हैं...   

‍‍~ कपिल सिंह चौहान
+91 9407117155

17 November 2016

ये अकेले प्रधानमंत्री मोदी के बस की बात नही है...




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हज़ार-पांच सौ के नोटों के बंद करने की घोषणा को काले धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी जंग मान लिया जाये तो आज सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों में से एक होने के नाते आपकी और हमारी ज़िम्मेदारी बहुत बढ़ गई है. आज जब अपने पैसे को निकलवाने के लिये लाईन में खड़े देशवासियों में से कुछ लोगों की मौत हो गई है तो उन्हें शहीद का दर्जा तो नहीं दिया जा सकता मगर उनके बलिदान को इससे कमतर भी नहीं आंका जा सकता. आज लाईन में खड़े सभी व्यक्ति भ्रष्टाचार और कालेधन के विरुद्ध देश की सबसे बड़ी जंग की शुरुआत पर अपनी-अपनी ओर से आहुति दे रहे हैं और इस आहुति में कुछ लोगों की मौत भी हो गई है.  

अपने ही 4500/- रुपये के नोट बदलवाने के लिये इस लम्बी कतार में घंटों खड़े रहने को अपनी ज़रुरत मान कर नहीं बल्कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस जंग में अपना योगदान मान कर खड़े होंगे  तो ही आप इस प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होने से रोक पायेंगे. आप अपनी तरफ से प्रयास नहीं करेंगे तो देश से भ्रष्टाचार और काला धन कभी खत्म नहीं हो पायेगा.

लाईन में खड़े होने में शर्म ना करना...क्योंकि आप देश के लिये जंग लड़ रहे हैं... लाईन में खड़े होने पर आप प्रधानमंत्री को कोसेंगे और थकेंगे तो अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्टाचारियों को कोसेंगे, जिन लोगों के पास अथाह पैसा है, उन्हें कोसेंगे कि उनकी वज़ह से आज आपको अपने घुटने तोड़ने पड़ रहे हैं... घर में शादी, मासिक राशन, बच्चों की फ़ीस, बस का टिकट, माता-पिता की दवाई के लिये आपको क्या-क्या नहीं सहना पड़ रहा... ज़रूर कोसिये ज़िम्मेदारों को... और इस सुची में अपने आप को भी ज़ोड लीजिए... हां... क्या आप स्वयं को नहीं कोसेंगे...!!!? क्यों...??  क्या आप ज़िम्मेदार नहीं हैं...???

माना कि आपके पास कालाधन नहीं है, बेनामी संपत्ति नहीं है, रिश्वत का पैसा भी नहीं है...मगर इस कालेधन और भ्रष्टाचार के लिये आप भी ज़िम्मेदार हैं, हम सब ज़िम्मेदार हैं...

लाईन में खड़े-खड़े याद करें कि कैसे आपने इस काली अर्थव्यवस्था को जन्म देने और पालने पोसने में अपना योगदान दिया है... याद है, जब आपने अपनी ईमानदारी की कमाई से, अपने सपनों का आशियाना बनाने के लिये छोटा सा प्लॉट खरीदा था तो उसकी रजिस्ट्री कैसे करवाई थी? कैसे आप उस दलाल और प्लॉट बेचने वाले की बातों में आ गये थे और फिर आपने 30% चेक से बाकी नकद देने की हामी भर दी थी... कुछ को यह भी याद होगा कि पिताजी की मृत्यु पर उनके नाम की ज़मीन जो स्वतः उनके नाम पर नामांतरित हो जानी चाहिये थी, उसके कैसे झट से पैंतीस हज़ार रुपये दे दिये थे तहसीलदार को...!!  अपने प्लॉट-मकान बिक्री में रजिस्ट्रारों को ऊपर से रुपया देना, ट्रैफ़िक पुलिस वाले से चालान बनवाने के बजाय रिश्वत देना, ट्रेन में जगह ना मिलने पर रिज़र्वेशन कप्म्पार्टमेंट में चढ़कर टी सी को "सेट" करके बर्थ कबाड़ना... शौचालय निर्माण किये बगैर 12,000/- रुपये पर हस्ताक्षर करके 6,000/- रुपये लेना, अपात्र हो कर भी बीपीएल राशन कार्ड बनवाने हेतु 5-7000 रुपये रिश्वत देना...

भाई साहब, आपने ही पैदा की है ये काली कमाई, देश की भी, अफसरों की भी, और उन सब की जिनके पास है ये काली कमाई... आप देते नहीं तो ये सरकारी नौकर आज बेलगाम हो साहब बनकर आपका शोषण नहीं करते...

एक और शब्द "खुशी से"... सरकारी चिकित्सालयों में आपने बेटा पैदा होने पर जो "खुशी से" पैसा बांटा था ना वो आज इतना "कंपल्सरी" हो गया कि आपको अपना ही पैसा लेने के लिये लाईन लगानी पड़ रही है... अरे, ये अफसर सरकारी कारिंदे हैं... आपकी सेवा के लिये इन्हें सरकार ने नियुक्त किया है जिसके लिये इन्हें आप ही के चुकाए टेक्स से त्ंख्वाह मिलती है... फिर आप इन्हें खुशी से क्यों रिश्वत देते हो?
घर में खुशी होने पर हिजड़ों को पैसा बांटा जाता है, क्योंकि उनका कमाई का कोई और ज़रिया नहीं है... वे आपकी खुशी में शामिल होते हैं, दुआएं देते हैं और बदले में आप उनके कुछ समय के राशन का इंतज़ाम कर देते हैं... मगर भ्रष्ट अफसरों को "खुशी से"...? अरे भई, ये अफसर हैं, शासकीय चिकित्सक हैं, बृहन्नलाएं थोड़ी ही हैं...! ढोल बजाने वाला आपके घर आपकी खुशी में "मंगल" बजा जाता है,  इसलिये आप उसे खुशी से बक्षीश दे देते हैं. ये अफसर ढोली थोड़े ही हैं...

मोदी समर्थक और उनकी पार्टी के नेता कह रहे हैं, मोदीजी देश का भ्रष्टाचार दूर करेंगे... कैसे करेंगे...? अकेले कर लेंगे...?? इन मोदी समर्थकों से पूछा है किसी ने कि ये भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ मोदी को क्या सहायता कर रहे हैं...? क्या आपके जिले में उपरोक्त वर्णित   परिस्थितियों में से एक भी परिस्थिति ऐसी नहीं है जिसमें आपको अवैध पैसा ना देना पड़ा हो...? अगर है तो आपके जिले के मोदी समर्थक क्या कर रहे हैं...?? क्या आपका जिला देश में नहीं आता... या मोदीजी किसी और देश का भ्रष्टाचार खत्म करेंगे...!!! या आप मान के चल रहे हैं कि आपके जिले में रामराज्य कायम हो चुका है...!!! मोदी चैन नहीं ले रहे तो उनके समर्थक कैसे इतने आराम से रह रहे हैं...? देश में, प्रदेश में तहसील कार्यालय, एसडीएम कार्यालय, कलेक्ट्रेट, पूलिस विभाग, पंजीयन विभाग, स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा, निजी विद्यालय, निजी शिक्षण संस्थान, शासकीय व निजी चिकित्सालयों में काले धन की गंगा बह रही है, और ये सब आपके, हमारे या अपनों द्वारा ही संचालित हैं... सबसे मह्त्वपूर्ण समस्त राजनितीक दलों के भ्रष्ट नेताओं का भ्रष्टाचार और कालेधन की उत्पत्ती में मह्त्वपूर्ण योगदान है और उनके ईमानदार साथी उनके इस कृत्य पर हमेशा चुप्पी साध लेते हैं... ये लोग आपके लाईन में खडे होने पर आपकी सेवा सुश्रुसा करें, पानी पिलायें नाश्ता करायें तो कह देना के भ्रष्ट और बेइमानों व उनके साथीयों की मदद नही चाहिये... लाईन में खड़े-खड़े भूखे-प्यासे मर जाना, एक-दुसरे के लिये घर से पानी नाश्ता ले जाना मगर इन राजनैतिक दलों के नेताओं-कार्यकर्ताओं के हाथों का पानी मत पीना...   
 धर्म युद्ध में आपको अपनों से ही लड़ना होगा... पांडवों के समक्ष भी उनके भाई ही थे... लाईन में खड़े होकर सिर्फ पैसे मत लीजियेगा, एक संकल्प भी लीजियेगा... संकल्प कि मैं इस भ्रष्टाचार और कालेधन को रोकने के लिये आज के बाद किसी को रिश्वत नहीं दूंगा... सामाजिक रूप से बहिष्कार करो उस नेता का जो आपसे पैसा मांगता है... रोज़ शिकायत करो उस अफसर कि जो आपके छोटे-बड़े कामों के लिये पैसा लेता है...कोई चपरासी, अधिकारी पैसा मांगे तो उससे कहो कि नौकरी में तंख्वाह मिलने के बावजूद मांग के खाने की आदत है तो किसी चौराहे पर बैठ जाओ, तुम्हारे जीवन भर के खाने का इंतेज़ाम हो जायेगा... और उस चौक पर बैठे भिखारी को उस चपरासी की जगह नौकरी पर रखवाने के लिये आवेदन करो... हंगामा करो, उत्पात मचाओ, मीडिया को बुलाओ... मगर एक पैसा भी बेहिसाब का किसी को मत दो...    
       जब तक आप स्वयं कमर नहीं कसेंगे, आपको बार-बार, लगातार आहूति देनी होगी... क्योंकि किसी मोदी में अकेले इतनी क्षमता नहीं है कि वो आपको एक भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र और कालाधन मुक्त अर्थव्यवस्था दे सके...!!

   ~ कुंवर कपिल सिंहं चौहान

22 April 2011

"फंदे के अधिकारी"- मिलावट खोर!!


           इधर महाराष्ट्र सरकार ने एक नेक काम की शूरूआत कर दी. केंद्र सरकार से अनुसंशा की गयी है की खाद्य पदार्थो में मिलावट करने वाले मीलावटखोरो को अपराध साबीत होने पर फांसी की सजा दी जानी चाहिए. ये बात दीगर है की ये विधेयक १९४७ के आसपास ही आ जाना चाहिए था, क्योंकि अब तो ये मिलावट का 'वाइरस' पूरे देश की रग- रग में समा चुका है...


महाराष्ट्र सरकार की इस अनुसंशा की ख़बर को टीवी चैनल्स ने जो शीर्षक दिए उनकी बानगी देखिये- "खैर नहीं है अब मिलावट खोरों की, फांसी के फंदे पर पंहुचा सकती है मीलावटीयों को उनकी करतूत, अब मिलावट करना आसान नहीं होगा". वाह!, दूध के धुले टीवी चैनल्स वालो को इस बात की बिलकूल शरम नहीं थी की पुरे दिन वे जिस मिलावट के धंधे में मशगूल रहते हैं उसी तरह की करतूत के खिलाफ विधेयक की सिर्फ अनुसंशा किये जाने की खबर को वो हल्ला मचा कर ऐसे दिखा रहे हैं के जैसे इस देश में अब तक सैकड़ो मीलावटीयों को अफगानिस्तान की तर्ज पर कोड़े और पत्थरों से बेदम किया जा चूका हो, सजा दी जा चुकी हो! ये न्यूज़ चैनल वाले अपने गिरेबान में झाँक कर क्यों नहीं देखते, जो अपनी सहूलियत के हिसाब से जब चाहे, जैसे चाहे खबरों की मिलावट करते हैं और जब चाहे तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं...


वर्ल्ड कप सेमीफायनल में आफरीदी की कप्तानी में इस बार पाकिस्तान जितनी विनम्रता से भारत से हारा है, ऐसी विनम्रता और सादगी पूर्ण हार पकिस्तान ने इससे पहले इतिहास में कभी स्वीकार नहीं की थी...यंहा तक की मैच के दौरान भी आफरीदी का सचिन, ज़हीर ओर धोनी के साथ व्यवहार बड़ा दोस्ताना और चेहरे पर मुस्कान थी. मैदान पर किसी पाक कैप्टेन की ये अदा भारतीय खेमे में स्वागत योग्य थी पर ऐसा हो न सका. हमारी समस्या यही है, हम पता नहीं क्यों युद्ध तो खेल भावना से करते हैं पर खेलो की खासकर क्रिकेट की हार जीत को किसी युद्ध की जय पराजय समझते हैं और इसी बात के बतंगड़ का फायदा उठाने की कोशिश करता है हमारा मीडिया. जीत के गौरव ओर भारतीयों की खुशी को भुनाने के लिए इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भारत और पाक की क्रिकेटीय रस्म को ऐसे-ऐसे शीर्षकों, और नामो से नवाज़ा है की कोई भी अपना आपा खो सकता है, खासकर हार के बाद! निजी तोर पर मुझे लग रहा था की मैदान पर हमने उन्हें हरा दिया तो हरा दिया, पर किसी सार्वजनिक माध्यम से इस विजय को बारबार कारगिल, ६५ और राजनैतिक मुद्दों से जोड़कर बताना, फूहड़ नारों से सजाना और उन्हें अपमानीत करना शायद भारतीय संस्कृति से मेल नहीं खाता है.ऐसे में यदि आफरीदी ने पाक जाकर वंहा हमारे मीडिया को आइना दिखाया तो इसमें गलत क्या है? मीडिया ने अफरीदी के बयानों में खुद के आरोपित होने की बजाय इधर उधर के अर्थ जोड़ कर देश को यह बताया की अफरीदी के हिसाब से “भारतियों को मेहमान नवाजी नही आती, हम जितना भी
हाथ बढ़ाये ये बदल नहीं सकते,” जबकी आफरीदी भारतियों से उतने खफा नहीं थे जितने की भारतीय मीडिया से. होना यह था की अफरीदी के बयान की प्रतिक्रिया किसी समझदार भारतीय मीडियाकर्मी से लेनी चाहिए थी लेकिन इसके बारे में जवाब हरभजन, युवराज और सुनिल शेट्टी से मांगे गए ओर वो भी तब जब इसकी पूरी सम्भावना है की इन तीनो को वास्तव में अफरीदी के पुरे बयान की जानकारी नहीं होगी, क्योंकि इन्होने प्रतिक्रिया तो उस बयान पर दी है जो इन्हें सम्मानीय न्यूज़ चेनल्स के रिपोटर्स ने अफरीदी का बयान बताया है.

वर्ल्ड कप मिलने के एक ही दिन बाद एक और मसला खड़ा हुआ और वह था नकली वर्ल्डकप का. यन्हा भी मीलावट!! ये बताया गया की 'असली कप' तो २१ लाख की ड्यूटी ना चुकाए जाने की वजह से कस्टम वालो के पास जब्त रखा हुआ है. अभी तक मुझे यह पता नहीं चल पाया की वास्तव में धोनी ने जो कप उठाया वो असली था या नकली था. लेकिन इस पर जो बयान बाजी हुई वह हास्यास्पद परंतू सोचनीय थी. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के उपाध्यक्ष राजीव शुक्ला से जब इस बाबद पुछा गया तो उन्होने कहा की देखिये नकली कप के बारे में मुझे कुछ नहीं मालूम, में इस पर नहो बोलूँगा. फिर उन्होने ही दबे मूंह यह भी कहा की “दिया गया कप भी, है तो असली ही पर वर्ल्ड कप की वह ट्राफी जो कस्टम वालो के यंहा जब्त है उसे समारोह में विजेता टीम को देने की परंपरा है और उसके बाद इस कप को आई सी सी के हेड क्वार्टर भेज दिया जाता है ओर बदले में विजेता टीम को वह कप दिया जाता है जो भारतीय टीम को समारोह में दिया गया”.. यंहा तक तो सब ठीक था, पर कस्टम वालो के खिलाफ प्रतिक्रिया देते हुए राजिव शुक्ला यह कह गए की कस्टम वालो को इस कप को ड्यूटी से मुक्त रखना चाहिए था...में पूछता हूँ क्यों??? आई सी सी, क्या हिन्दुस्तान की गोद ली हुई औलाद है जो उसे २१ लाख रूपये का लाभ दिया जाना चाहिए था?? राजीव शुक्ला जैसे व्यक्ति जो पहले पत्रकार थे, फिर नेता भी हुए, फिर राज्यसभा सदस्य फिर
बी सी सी आई के सदस्य, फिर एक न्यूज़ चैनल के मालिक, उन्हि राजिव शुक्ला ने एक नहीं दो-दो बड़े न्यूज़ चैनल्स पर ये कहा की "ये कप तो देश की धरोहर है और इसे क्यों ड्यूटी के नाम पर रोका गया? उन्होने कहां की कस्टम विभाग को ये तय करना चाहिए के किस वस्तु पर टैक्स लें और किस पर नहीं. पहली बात तो यह की यदि राजिव शुक्ला को कस्टम के नीति नियमो से शिकायत है तो अपने इस बयान के पहले और अब बाद में भी उन्होने कभी इन नियमो मे सुधार के लिए क्या कोई पहल की है? नहीं. क्योंकि आपको 'स्टेडीयम' से बाहर निकलने की फुर्सत मिले तब तो आप ऐसा करेंगे!! दूसरी बात यह की जो राजीव शुक्ला वर्ल्ड कप को देश की धरोहर बताकर कस्टम को ब्लैक मेल और देश को इमोशनल ब्लैक मेल करना चाह रहे थे उन्हें यह नहीं पता था की वर्ल्ड कप को कस्टम ने फायनल मैच के एक दिन पहले ही जब्त कर लिया था, तब तक वह देश की धरोहर नहीं था और भगवान् न करे यदि भारत श्रीलंका से हार जाता तो वह कप हमारी नहीं, श्रीलंका की धरोहर होता..यही नहीं राजीव शुक्ला से प्रश्न करने वाले दोनों ‘अनुभवी’ मीडिया कर्मियों ने भी इस बात पर कोई गौर नहीं किया की 'कप' को तो देश की धरोहर बनने के पहले जब्त किया गया था. साफ़ था, ना तो राजीव शुक्ला तथ्यों से वाकीफ थे, ना उन्हें ईसकी परवाह थी और मीडिया बंधू तो तर्कों को भूल कर सिर्फ २-३ मिनटों के हंगामा खड़ा करने के मकसद से बैठे थे. राजिव शुक्ला की मजबूरी यह थी की वो चाहकर भी देश हित की बात नहीं कर पा रहे थे क्योंकि यदि वे ऐसा करते तो उन्हें आई सी सी के खिलाफ बोलना पड़ता और आई सी सी (आई) के खिलाफ़ मतलब शरद पवार (बाबा) के खिलाफ़. अब वे ' अपने भविष्य (बी सी सी आई के अध्यक्ष पद) के साथ खिलवाड़ तो नहीं करना चाहेंगे ना!!

अरे मैं कहता हूँ देश की धरोहर भी हो तो भी उसके एवज में आई सी सी को क्यों २१ लाख रुपैयों की छूट दी जानी चाहिए? सिर्फ इसलिए क्योंकि एक 'भारतीय' शरद पवार इस वक़्त अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के अध्यक्ष हैं. शरद पवार के अध्यक्ष होने का एक और नुकसान हमारे देश को भुगतना पड़ा और वह यह की इस पुरे वर्ल्ड कप इवेंट को भारत में टैक्स फ्री घोषित किया गया, जो की पूरी दुनिया में होने वाली खेल प्रतियोगिताओ में सबसे ज्यादा कमाऊ पांच आयोजनों में से एक है. उफ्फ्फ..सुना है सिर्फ आई सी सी ने इस आयोजन से ९०० करोड़ रूपया बनाया है जो की घोषित है, ऊपर की कमाई का तो खेर हिस्साब ही नहीं होगा, यानि ४० से ४५ करोड़ रूपया तो भारत सरकार ने आई सी सी से इसलिए नहीं लिया क्योंकि शरद पवार उसके अध्यक्ष हैं. कर में यह छूट उन्ही शरद पवार को दी गयी जिन्होंने कोर्ट के आदेश को भी न मानते हुए गोदामों में सड़ रहे हज़ारो क्विंटल अनाज को गरीबो में बांटने से इनकार कर दिया था.
अरे साहब ! ये कोई कबद्दी या हाकी नहीं बल्कि धनपतियों-कुबेरों का 'गेम' है, यंहा स्टेडियम में एक दर्शक, एक मैच के लिए, एक सीट का उतना रूपया दे कर बैठता है जीतना शायद हाकी का एक खिलाड़ी पुरे साल नहीं कमाता.


ईसकी जांच क्यों नहीं की जानी चाहिए की किसके दबाव में इतने बड़े कमाऊ आयोजन को कर- मुक्त रखा गया?? क्या यह वाकया राजा और कलमाड़ी से मिलता जुलता नहीं लगता आपको ? क्या ज़रुरत थी की देश के खजाने को नुकसान पंहुचा कर आई सी सी को राहत दी गयी...क्या पकिस्तान के प्रधान मंत्री, श्रीलंका की राष्ट्रपति, और ऐसे तमाम ख़ास मेहमानों की आवभगत और सुरक्षा व्यवस्था में हुए करोडो रूपयों का खर्च और प्रबंध आई सी सी ने किया था??


क्यों नहीं, खेल में राजनीति की मिलावट, समाचारों में फिल्मो की मिलावट, फिल्मो और अंडर वर्ल्ड, टेली शापिंग और असत्य, पुलिस और क्राइम, बिल्डर्स और ब्रोकर्स, न्यूज़ चेनल्स और कोर्पोरेट, पत्रकार और नेता ओर ऐसे तमाम संयोजनों को प्रेरित करने वालो के खिलाफ़ भी एक विधेयक लाया जाना चाहिए और इन मिलावाटीयों को भी फांसी की सजा दी जानी चाहिए?


 
:- कुंवर कपिल सिंह चौहान